नाम राम कथा 10
रामनामाकंन योग से युक्त योगी
अर्थात रामनामाकंन को समर्पित भक्तों की अवस्था ।
रामनामकंनकर्ता भक्तों में मुख्यतः निम्मानुसार उतम ,मध्यम, मंद प्रकृति के महानुभावों के दर्शन होते हैं।
गोस्वामी जी कहते हैं कि,
"जापक जन प्रहलाद जीमि"
यह उत्तम भक्त होगें।
राम नाम भक्तों में ,ध्रुवजी, सबरीजी,गणेशजी,शिव पार्वती, कार्तिकेय ,अजामिल,गज,गणिका आदि जैसे अनेक भक्त हुये हैं और अनेक तर गये हैं परंतु उन्होने नाम वंदना करते हुए कलिकाल में प्रहलाद जी जैसे , भक्त होने का वर्णन किया।
भक्तराज प्रहालदजी के जैसे जपना हैं। प्रहलादजी जैसे रामनामाकंन करना।
यहाँ कलिकाल हैं ,और कलिकाल का प्रभाव हिरण्याकश्यपु जैसा हैं, और रामनामाकंन कर्ता भक्तों पर अपना प्रभाव डालता रहता हैं, तब भक्त प्रहलाद कीतरह अटल निष्ठा से रामनामाकंन करते रहने की आवश्यकता हैं।
भक्त प्रहलाद का रामनाम अंकन विलक्षण था,
जब उनको गुरु के पास अध्ययन के लिए भेजा जाता तो वो गुरुजी क्या पढा़ रहे होते थे, और वो राम राम लिख रहे होते थे।
उनकी दीन दुनिया बस रामनाम ही था।
कभी वो दिवालों पर तो कभी धरांकन अर्थात धरती पर तो कभी वो करांकन करते रहते , मात्र एक ही धुन,रामनामाकंन।
प्रहलाद जी के जीवन का संदर्भ रामनामाकंन कर्ताओं सहित राम नाम के प्रति समर्पित भक्तों के लिए दिया।
क्योंकि रामनाम को नरकेसरी बताया,
नर केसरी अर्थात भगवान नृसिंह का रूप, और कलिकाल को कनककसिपु अर्थात हिरण्याकश्यप बताया। जो स्वयंभू भगवान हैं।
वो तो एक ही था, यहाँ कलिकाल में तो करोडो़ स्वयंभू भगवान हैं,।।
एक तो अभी दो दिन पहले ही पुलिस की पकड़ में आगये जो अपने आपको कल्कि अवतार घोषित किये बैठे थे। और नाजायज अकूत सम्पदा सहित पकडा गये।
तो कलियुग के दो रुप हैं। एक तो धर्म की आड में अधर्म, इसको आडंबर या दम्भ कहलो।
चाहे साधक स्वयं दम्भ करें या किसी अन्य के दम्भ से भ्रांत हों। ये दोनो दम्भ आडंबर में आजाते हैं। रामनाम मुख पर और अहंकार आसमान पर, रामनाम घट बैठते ही नम्रता आजाती हैं, दम्भ मिट जाता हैं।
दुसरा हैं प्रत्यक्ष अधर्म।
यह बडा़ भयंकर हैं, इसमें पाप कर्म करते हुये घृणा,लज्जा,भय नहीं होता।
कलि के प्रथम रुप को गोस्वामीजी ने कालनेमि कहा हैं, और दुसरे को दुर्दमनीय हिरण्यकश्यपु बताया।
कलिके दम्भात्मक रूपसे सच्चे साधक को भ्रान्त करने का प्रयत्न भी एक सीमा तक उनका समर्थन करते हुए ही होता हैं।
कलियुग के प्रत्यक्ष अधर्मरूपके द्वारा सिधे साधकों को सेवकों को उत्पिडित किया जाता हैं, जलील करने की प्रवृत्ति ने पकडा हुआ होती हैं ?
अधर्म का यह रूप अपने आप में सन्तुष्ट नहीं रहता ,यह सदा असन्तुष्टि से घीरा रहता हैं।
यह दुसरों द्वारा की जाने वाली ईश्वरीय पूजा को भी अपराध बना देना उसका लक्ष्य रहता हैं।
जैसे हिरण्य कश्यप अपने आपको सर्वोपरि मानने लगा था। ऎसे ही कलिकाल के दम्भी ,अपने अतिरिक्त दुसरे द्वारा किये गये पाठ परायण आदि को अपमानित करेगें।
कुछ भी हों शासक कितने ही क्रुर हों पर किसी की वाणी पर तो प्रतिबन्ध नहीं लगा सकते ना ?
प्रहलाद जी को गुरुकुल से हटा कर हिरण्य कश्यप ने अपने सामने रखवा लिया, तो प्रहलाद जी ने दिवालो पर राम राम लिखना आरंभ कर दिया, हाथ बन्धवा कर खडा कर दिया तो पैरों से ,यानि खडे खडे पैर के अंगुष्ठ से राम राम लिखने लगे तो पैर भी बन्धवा दिये, तब प्रहलाद जी ने मुख से राम राम, बोलने लगे तो मुख पर पट्टी बन्धवा दी, तब मन में ही राम राम।
तो भीतरी मनन पर अंकुश कैसे लगेगा ?
"""""जापक जन प्रहलाद जिमि"""
पालिहि दलि सुरसाल।।
हिरण्य कश्यपु ने जैसे वरदान मांगा था कि, कैसे भी कोई भी मुझे नहीं मार सकें।
वैसे ही कलिने माँगा कि, यदि कोई ज्ञान वैराग्यादि वाणों से मुझे छेदन करे तो मेरा तेज और अधिक हो जाये।
जापक के कागजरुपी चौक में कलम रुपी खम्बे से निकला रामनाम रुपी नृसिंह निकलकर कलिका नाश करेगें।
रकार सिंह और मकार नरवत हैं।
कलियुग को रामनामाकंन कर्ता पर क्रोध का कारण यह हो सकता है कि,
द्वापर में जन्मे हुये राजा नल , युधिष्ठिर महाराज,और राजा परिक्षित भी मेरी आज्ञा पर चले — जूआ खेले,घोडे़पर चढ़े ,फल के बहाने मांस खाया, मुनि के गले में मरा हुआ सांप डाला; और यह रामनामाकंन कर्ता मेरे ही राज्य में जन्म लेकर मेरी आज्ञाके विरुद्ध चलता हैं !
रामनाम जपेगा, रामनाम जपायेगा; रामनाम बैंक चलायेगा ?
इससे पहले गोस्वामीजी ने
"कालनेमि कलि कपट निधानु, नाम सुमति समरथ हनुमानु। लिखा हैं।
यह जरा समझने वाली बात हैं।
पहले कालनेमि कलिको रखा तब ' हनुमानजीको' और बाद में दोहे में पपहले नरकेसरी को और बाद में कलिकाल को मतलब एक में मारने वाले को पहले और दुसरे में पिच्छे कहा गया हैं।
यहां गोस्वामी जी ने शब्दों का यह हेरफेर वैसे ही नहीं किया बल्कि यहाँ भाव भरे हैं।
कालनेमि ......में यह दिखाया कि, नाम महाराज अपनी रक्षामें इतने निश्चंत हैं, इतने लापरवाह हैं कि, कालनेमि कलियुगको देख रहे हैं फिर भी देखा को अनदेखा जर रहे हैं। उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। रामनाम पर जिसका दृड़ विश्वास हैं वो ऎसे तत्वों की हरकतों को सामने देखते हैं पर उसका प्रत्युतर नहीं देते बल्कि उसकी उपेक्षा कर देते हैं। कारण रामनाममहाराज उसकी रक्षामें पहले ही तैयार रहते हैं।
पुनः दुसरी अर्धालि में बताया कि, श्रीहनुमानजी ने यह जानकर भी कि यह राक्षस है, साधु बनकर ठगना चाहता हैं तो भी वो उसपर रोष व्यक्त नहीं कर रहे हैं।
वैसे ही श्रीरामनाममहाराज और रामनामाकंनकर्ता भक्त भी अपने उपर अपराध करनेपर भी रोष नहीं करते।
परंतु आगे के दोहे में यह बताया कि,
यदि कोई जापकजन पर अपराध करें तो रामनाममहाराज उसे नहीं सह सकते हैं।
उसके लिए नरसिंह रूपसे सदा तैयार रहते हैं।
यथा
"सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ।
निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।
जो अपराध भगत कर कर ई।
राम रोष पावक सो जर ई।।
लोकहु बेद बिदित इतिहासा।
यह महिमा जानहिं दुरवासा।।
अतः बन्धुवों जैसे भी हों रामनामाकंन करते तरह हो।
भाय कुभाय अनख आलसहूं।
नाम जपत मंगल दिसी दसहूं।।
अतः जैसे भी हों रामनामाकंन करो कराओ
लख चौरासी से मुक्ति पाओ।
पं बी के पुरोहित
संस्थापक
श्री राम नाम धन संग्रह बैंक अजमेर